18 PAAP STHANAM LIVE PRAVACHAN from MATUNGA (WATCH LIVE)

PARIVARTAN

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This Pravachan is Part II of 18 PAAP Sthanam Series which was telecasted live from MATUNGA – Mumbai.

PART I- (1 to 9 PAAP STHANAM – DVD )

PART- II (10 to 18 PAAP STHANAM – DVD)

will be made available soon. keep track of the same in this section and on the bookstore link attached below.

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PARIVARTAN PRAVACHAN on 18 PAAPSTHAN Date : 23rd Aug 2015 (Series I : 9 PAAPSTHAN )

1. पद यात्रा: पाँव से

2. शब्द यात्रा:जबान से

3. अर्थ यात्रा:उसकी depth में जाएंगे

4. भाव यात्रा: आप के दिल से… ह्रदय से… आसुओं ने इतिहास बनाया है।

आज की यात्रा भाव यात्रा है…

माफ़ करे वो माँ

साफ़ करे वो माँ

याद करे वो माँ

भगवान् की करूणा की भी कोई सीमा नहीं…  शारीर का, मन का और आत्माँ की गलतियों को अभी भी माफ़ कर सकता है।

18 पापस्थानक की माफ़ी…

(Todays Pravachan on 9 Paap Sthan)

1. प्रणातिपात:

शारीर: भरता रहेगा और खाली होते रहेगा.. नदी के जैसा

मन: भरते चलो, भरते चलो… खाली होने का nature ही नहीं… सागर के जैसे।

सारे पाप हमने किये है शरीर और मन के लिए…

किये हुए पाप कम है पर जो पाप हम करना चाहते थे वो तो कई ज्यादा है।

आत्मा: ना कभी भरा जाता है ना कभी खाली… आकाश के जैसे…

शरीर करता है… मन कराता है।

भगवान् शरीर को तो हम संभाल लेंगे… मन को आप

1. मेरे बिना जीवन ना चले ऐसे जीवों की संख्या कम है… पर कितने जिव ऐसे है जिसका मैंने सहारा लिया… मेरे जीवन के लिए।

पानी, वनस्पति, हवा के जिव की मैंने मरे जीवन में जो हिंसा की है उसकी मैं माफ़ी मांगता हु।

4 प्रकार के जिव है…

आरोग्य का सूख सब से महत्व का बताया गया है… मोक्ष को 10 वां बताया गया है।

योग के लिए भी… त्याग के लिए भी… भोग के लिए भी स्वास्थ्य की आवश्यकता है।

abortion कभी नहीं
non veg कभी नहीं

आँख में आसु के साथ अगर सच्चे दिल से माफ़ी मागो भगवान जरूर माफ़ करेगा…

2. मृषावाद:

अनंत अवसर्पिणी के बाद एक जबान का इन्द्रिय मिलता है। उससे जूठ बोलना चाहिये? उसका दुरुपयोग माने डायमंड से कौए को उड़ाने के लिये करने बराबर है।

atleast एक…. सिर्फ एक… भी ऐसा आदमी आप के जिवन में है जिसके पास आप ने जूठ नहीं बोला है???

मया ही इसका कारण है…।

जहाँ आप का कोई लाभ ना हो रहा हो नाही कोई नुकसान वहां पे भी जूठ….!!!

चन्दन का विलेपन शरीर को ठंडा कर देगी… मगर आग लगा दो तो जल के ख़ाक..

आप के श्रद्धा का केंद्र जो लोग है और आप जिसकी श्रद्धा के केंद्र में हो… वहां कभी जूठ नहीं।।

कम से कम… माँ बाप परिवार और गुरु के सामने जूठ बोलना छोड़ सकते हो??

पाप कितना भी बड़ा हो आंसू की ताकात से छोटा हो जाता है… धर्मं कितना भी छोटा हो smile से उसकी ताकात बढ़ जाता है।

3. अदत्तदान:

पाप से बचने का प्रयास…

परधन.. परदारा…परनिंदा से बचने का प्रयास…

परधन: अदत्ता मतलब आप को जो ना दिया गया हो वो… आदान मतलब आप ने ले लिया है… जिसका है उसे पूछे बिना। अदत्तादान।

किसी एक क्षेत्र में चोरी करने की मजबूरी हो सकति है… पर उस एक क्षेत्र के अलावा और सभी जगह …

गलत का प्रयोग जब भी आप के जीवन में आता है तो सकारण हो सकता है पर आगे जाके कारण निकल जाता है… गलत रह जाता है।

प्रवृत्ति से मुक्त होना सरल है… आदत से मुक्त होना कठिन है।

desire नहीं burning desire होना चाहिए तभी कर सकते हो।

stitch in time saves the nine…

चलो इतना नक्की कर लो… जहाँ 10 Rs का सवाल हो वहां चोरी नहीं करेंगे।

गलत प्रवृत्ति करना कैंसर है पर उसकी आदत पड जाये वो ब्लड कैंसर है।

4. परदारा:

4 चीज आँखों के सामने रखना..धर्मं के 4 प्रकार

दान
शील
तप
भाव

पर भाव सबसे मुश्किल… दान और तप करने वालों को भी भाव कभी कभी आता है।

4 इन्द्रिय में सब्से कठिन control करना है तो चक्षु इन्द्रिय है… उसको control में करो..

पवित्रता बरकरार रखना चाहते हो तो:

1. एकांत से बचो… यह पानी को ढलान पे ले जाने जैसा है।

2. अंधकार से बचो:

3. अति परिचय से बचो: distance रखो… especially विजातीय के साथ

4. अलंकार से बचो; माने समृद्धि…

एक बार चारित्र्य गया तो वापिस आना करीबन असंभव…

5. परिग्रह परिमाण

आसक्ति से बचने का प्रय्यास: जो आ सकती है पर जा नहीं सकती ये simple defination है।

या तो त्याग कर सकते हो या तो जो चीज अपने आप चली जाये तो ठीक है…

आग्रह बुद्धि से बचो: इससे परिग्रह बढ़ाता है…

अधिक से बचो: anything in access is poison…

दूध में शक्कर भी अगर अधिक हो तो वो बेस्वाद हो जाता है… भोजन में नमक भी अधिक हो तो??

शान्ति
प्रेम
प्रसन्नता … यह disturb होने लगे तो समज लेना की सम्पति अधिक होने लगी है।

अधिकार से बचो:

अधिकार का ज्यादा होना यह भी परिग्रह है।

धिक्कार से बचो

इन 5 से बचो… आसक्ति, आग्रह, अधिक, अधिकार, धिक्कार…

6.क्रोध:

4 चीज… No.1, 2 और 3 को ignore कर सकते हो पर 4 No को नहीं कर सकते….

1. परमात्मा… आप नहीं मानते हो.. हो सकता है…

2. पुण्य कर्म: किस्मत luck बोल सकते हो…  हो सकता है…

3. प्रेम : लेने वाला भी चाहिए और देनेवाला भी चाहिए…शायद आप इसको भी ना गिनो…

4. प्रसन्नता: यह तो चाहिए ही चाहिए… किसको नहीं चाहिए??

क्रोध यदि आप करते हो तो वो परमात्मा को दूर कर देता है… पुण्य को तोड़ देता है… प्रेम को खत्म कर देता है… प्रसन्नता को भगा देता है। फिर ऐसा क्रोध क्यों???

हाथ मारे त्यारे हैयु रडे तवो क्रोध… माँ जेवो क्रोध… संमार्गे लाववा माटे नो क्रोध करवानी छूट छे…. बाकी नहीं।

7. मान:

दूध में डाली हुई बादाम आप निकाल सकते हो… अभिमान ऐसा होता है…

मगर शक्कर हो तो उसका अस्तित्व महसूस कर सकते हो पर दिखता नहीं और अलग नहीं हो सकता वो है…

और एक अभिमान सागर में नदी जैसा विलीन हो जाता है…

पर अपना अभिमान कैसा होना चाहिए….? ना विलीन, नया व्यापक, ना विषिष्ट बने मगर विशुद्ध बने….

मान की दो पहचान;
मुझे आदर मिले
मेरी कदर हो
पर ये नहीं होना चाहिए…

पर आप भगवान् से प्रार्थना करो की मुझे ऐसा आशीर्वाद दो की सुकृत की ताकात बढाती रहे

8. माया;

एक सीधा अर्थ… मा माने नहीं… या माने जो… जो है ही नहीं उसका नाम है माया…

रोग को छुपाने से ज्यादा से ज्यादा मौत आती है…. मगर दोष को छुपाने से दुर्गति नजदीक आ जाती है…

मै पापी हूँ….. मैं पाप मुक्त बनाना नहीं चाहता हूँ…. मगर हम पापी है वो दिखाना नहीं चाहता…यह है माया।

मै धर्मी नहीं हूँ … मैं धर्मि बनाना भी नहीं चाहता… मगर मै धर्मी हूँ ऐसा दिखाना चाहते हो…यह है माया।

कम से कम खुद के साथ प्रमाणिक हो? अपनी

सड़ी गयेला लकड़ा ऊपर नु सन्मायाका एटलें माया…

पाप करने वाले तो छूट जाते है पर पाप का बचाव करने वाले कभी नहीं छूट सकते…यह बात जान लो।

9. लोभ:

इसका विवेचन अगली बार।

यहां से निकलने के बाद कम से कम पाप की व्यथा मन में जरूर आ जानी चाहिए…सिर्फ वाह वाह कर के भूल नहीं जाना है।

PARIVARTAN PRAVACHAN Date: 21 Aug 2015

कुलीन और अकुलीन में फर्क क्या है?

परोपकार करने के बाद जो मौन रह जाता है वो कुलीन है।

परोपकार करने के बाद जो उसकी बाते करते है वो अकुलीन है।

सत्कार्य के 3 benefit:

1. प्रशंसा मिलती है – लोग करते है… अगर प्रशंसा कम होगी तो आप का सत्कार्य करने का मन कम हो सकता है।

2. पुण्य कर्म बंधन होता है – परमात्मा करते है..

3. प्रसन्नता मिलती है – खुद को अनुभति होती है।

जब आप डोनेशन करते हो तो प्रशंसा की अपेक्षा करते हो या नहीं? प्रशंसा नहीं हो तब भी आप सत्कार्य करते रहते हो ऐसे प्रसंग जीवन में कितने??

आप अगर प्रसन्नता के लिए सत्कार्य करते रहोगे तो सत्कार्य करने का चालू ही रहे सकता है।

लोग प्रशंसा करे या ना करे वो उनका प्रश्न है।

मैं प्रवचन देता हूँ…ना प्रशंसा के लिए, ना परिवर्तन के लिए… सिर्फ प्रसन्नता के लिए करता हूँ।

किसीके सत्कार्य की आप प्रशंसा जरूर करो… ना करो तो अपराध है। पर सत्कार्य कर के प्रशंसा की अपेक्षा ना करो… सिर्फ प्रसन्नता के लिए करो तो हमेशा लंबे टाइम तक आप सत्कार्य करते रहोगे… करते रहोगे…।

दान देते वक़्त हमारी मानसिकता ऐसी क्यों की जो चीज हमारे लिए निक्कमी है उसीका दान देना चाहते है? कम से कम आप के पास उपयोग करने के बाद जो आप के पास अधिक है वो तो दो।

दूध पुरे दिन के उपयोग के बाद बच गया तो उसका दान क्यों नहीं… उसका दही क्यों?

रोटी बच गयी तो उसका दान क्यों नहीं… उसका खाखरा क्यों?

सड़ा हुआ दोगे तो सड़ा हुआ ही पाओगे।

सूरज भरपूर प्रकाश देता है फिर चला जाता है… ना पहले आवाज ना बाद में आवाज… हमेशा शांत।

बादल पानी देने के पहले गर्जना करता है पर देने का बाद शांत…

सागर गर्जना बहूत करता है मगर देता कुछ नही…

रेगिस्तान में पानी दीखता है पर मिलता नहीं…मृगजल होता है… हीरन दौड़ के जाता है और फिर मर जाता है…

हम कैसे है?  सूरज जैसे… बादल जैसे… सागर जैसे… की फिर मृगजल जैसे???

कभी भी कोई भी धर्मं करो… छोटा या बड़ा… आप की प्रसन्नता के लिए करो।

3 अवस्था जिंदगी की:

बाल्य अवस्था: समय पर्याप्त है… ना समाज है… ना शक्ति है

वृद्धावस्था: परयाप्त समय है… समज है… पर शक्ति बची नहीं है

युवावस्था: समय है… समज है… शक्ति है… तीनो आपके पास है… सत्कार्य करने का best time यही है।

वृद्धावस्था में तो पाप करने की भी ताकात नहीं होगी तो धर्मं कैसे करोगे…!!!?

आप ने संपत्ति के लिए कितना समय दिया है वो तो  सोचो या ना सोचो …. मगर ये पूछो अपने आप को… की संपत्ति ने आप का कितना समय लिया है???

संसार में check कर लेना… दो ही चीजे मिलेगी… या क्लेश या संक्लेश..

धर्मं करने का एक ही rule… now & here…

आप के सत्कार्य को बोलने दो आप की जबान को नहीं।

प्रशंसा और पुण्य से जूडा हुआ सत्कार्य करो… मगर प्रसन्नता के लिये किया हुआ सत्कार्य आप को मोक्ष के नजदीक ले जायेगा ये निश्चित है।

सत्कार्य करो… युवावस्था में करो… प्रसन्नता के लिये करो।

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